जल प्रदूषण के खिलाफ नई उम्मीद: आईआईटी रुड़की की नैनो-सक्षम सतत तकनीक सफल

(ब्योरो – दिलशाद खान।KNEWS18)
आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिकों ने जल से विषैले प्लास्टिक प्रदूषकों को तेज़ी और प्रभावी ढंग से हटाने के लिए एक नैनो-सक्षम तकनीक विकसित कर देश और दुनिया को नई उम्मीद दी है। यह शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल ACS ES&T Water में प्रकाशित हुआ है और भारत के सतत विकास मिशनों के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर प्लास्टिक प्रदूषण और जल संदूषण की चुनौती से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।इस नवाचार के तहत शोधकर्ताओं ने विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए पोषक-तत्व-युक्त नैनोफॉस्फेट कण विकसित किए हैं, जो जल में मौजूद प्रदूषक-विघटन करने वाले जीवाणुओं को सक्रिय करते हैं। यह तकनीक बिना किसी द्वितीयक प्रदूषण के कुछ ही घंटों में जल से फ़्थेलेट्स जैसे विषैले प्लास्टिक योजकों को हटाने में सक्षम है। फ़्थेलेट्स प्लास्टिक को लचीला और टिकाऊ बनाने के लिए उपयोग किए जाते हैं, लेकिन ये हार्मोन तंत्र, प्रजनन और मानव विकास पर गंभीर दुष्प्रभाव डालते हैं।
आमतौर पर फ़्थेलेट्स नदियों, भूजल और अपशिष्ट जल में पाए जाते हैं। यद्यपि कुछ जीवाणु स्वाभाविक रूप से इनका विघटन कर सकते हैं, लेकिन वास्तविक परिस्थितियों में यह प्रक्रिया धीमी होती है क्योंकि दूषित जल में सूक्ष्मजीवों की वृद्धि के लिए आवश्यक पोषक-तत्वों की कमी होती है। पारंपरिक तरीकों में पोषक-तत्व जोड़ने से यूट्रोफिकेशन का खतरा बढ़ जाता है, जिससे जल गुणवत्ता और खराब हो सकती है।
इस समस्या के समाधान के लिए आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिकों ने बहु-पोषक नैनोफॉस्फेट कण विकसित किए, जो सूक्ष्म पोषक-भंडार के रूप में कार्य करते हैं। ये कण फॉस्फ़ोरस, मैग्नीशियम, कैल्शियम और सूक्ष्म धातुओं जैसे आवश्यक तत्वों को धीरे-धीरे उसी समय और स्थान पर छोड़ते हैं, जब जीवाणुओं को उनकी आवश्यकता होती है।
जब इन नैनोफॉस्फेट्स को प्रदूषक-विघटन करने वाले जीवाणु Rhodococcus jostii RHA1 के साथ प्रयोग किया गया, तो बिना किसी अतिरिक्त पोषक माध्यम के साधारण जल में भी केवल तीन घंटों के भीतर फ़्थेलेट्स का लगभग पूर्ण निष्कासन संभव हो गया। विशेष बात यह रही कि जीवाणुओं की वृद्धि तुरंत शुरू हुई, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि नैनोकणों से पोषक-तत्व सीधे और प्रभावी रूप से उपलब्ध हो रहे हैं।
शोध के दौरान उन्नत सूक्ष्मदर्शी और स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीकों से यह भी सामने आया कि जीवाणु नैनोफॉस्फेट कणों पर उपनिवेश बनाकर उनसे पोषक-तत्व निकालते हैं। यह नियंत्रित घुलनशीलता पोषक-तत्वों की अधिकता को रोकती है और जीवाणुओं को निरंतर ऊर्जा प्रदान करती है।
आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रोफेसर के. के. पंत ने इस शोध को वैश्विक सततता चुनौतियों के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि बताया। शोध दल का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में अन्य प्रदूषकों और सूक्ष्मजीवी प्रणालियों के लिए भी उपयोगी सिद्ध हो सकती है, जिससे जल और मृदा पुनर्स्थापन के क्षेत्र में नई संभावनाएँ खुलेंगी।

