*सूखे का बढ़ता खतरा और घटते जल स्रोत: आईआईटी रुड़की के अध्ययन ने बढ़ाई चिंता*

(ब्योरो दिलशाद खान।KNEWS18)

रुड़की, 24 जुलाई। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की और जी. बी. पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान (GBPNIHE), कोसी के संयुक्त अध्ययन में उत्तराखंड की कोसी नदी बेसिन को लेकर गंभीर चेतावनी दी गई है। शोधकर्ताओं के अनुसार यदि जलवायु परिवर्तन की वर्तमान गति जारी रही तो आने वाले दशकों में कुमाऊँ क्षेत्र को बढ़ते तापमान, घटते भूजल पुनर्भरण और बार-बार पड़ने वाले सूखे जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इसका सीधा असर कृषि, पेयजल आपूर्ति, प्राकृतिक जलस्रोतों और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ेगा।
यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका Theoretical and Applied Climatology में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन का नेतृत्व आईआईटी रुड़की के डॉ. बी. दास एवं डॉ. एस. सेन तथा जी. बी. पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के डॉ. संदीपन मुखर्जी ने किया। शोधकर्ताओं ने भविष्य की जलवायु परिस्थितियों का आकलन करने के लिए पाँच प्रमुख वैश्विक जलवायु मॉडलों को Soil and Water Assessment Tool (SWAT) मॉडल के साथ जोड़कर कोसी नदी बेसिन के जलवैज्ञानिक व्यवहार का विस्तृत विश्लेषण किया।
अध्ययन में सामने आया कि 21वीं शताब्दी के अंत तक अधिकतम तापमान में उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है। वर्तमान में लगभग 38.4 डिग्री सेल्सियस रहने वाला अधिकतम तापमान मध्यम उत्सर्जन परिदृश्य में 41.6 डिग्री सेल्सियस तथा उच्च उत्सर्जन परिदृश्य में 43.2 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच सकता है। तापमान में वृद्धि के कारण वाष्पीकरण और वाष्पोत्सर्जन बढ़ेगा, जिससे जल उपलब्धता लगातार कम होती जाएगी।
शोध के अनुसार वर्ष 2100 तक कोसी नदी बेसिन की कुल जल उपलब्धता में लगभग 4 से 7 प्रतिशत तक कमी आने की आशंका है। वहीं वाष्पोत्सर्जन में लगभग 13 प्रतिशत की वृद्धि और भूजल पुनर्भरण में 20 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की जा सकती है। इसके विपरीत सतही अपवाह में लगभग 20 प्रतिशत की वृद्धि होने की संभावना है, जिससे वर्षा का पानी तेजी से बह जाएगा और जमीन के भीतर पानी के रिसाव में कमी आएगी। इसका परिणाम यह होगा कि प्राकृतिक जलस्रोतों और भूजल भंडारों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।
जी. बी. पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के निदेशक डॉ. आई. डी. भट्ट ने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के कारण जलवैज्ञानिक प्रणाली तेजी से बदल रही है। बढ़ते तापमान के चलते वाष्पोत्सर्जन बढ़ेगा और भूजल पुनर्भरण घटेगा। उन्होंने कहा कि पर्वतीय समुदाय मुख्य रूप से प्राकृतिक स्रोतों और स्थानीय जल संसाधनों पर निर्भर हैं, इसलिए भविष्य के जल संकट से निपटने के लिए विज्ञान आधारित जल प्रबंधन और प्रभावी अनुकूलन रणनीतियाँ अपनाना समय की आवश्यकता है।
आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रो. कमल किशोर पंत ने कहा कि जलवायु परिवर्तन पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र की जल सुरक्षा के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। ऐसे वैज्ञानिक अध्ययन नीति-निर्माताओं को ठोस आधार प्रदान करते हैं, जिससे जल संसाधनों का संरक्षण, आजीविकाओं की सुरक्षा और पारिस्थितिकीय संतुलन बनाए रखने के लिए प्रभावी नीतियाँ तैयार की जा सकें।
अध्ययन में यह भी चेतावनी दी गई है कि भविष्य में सूखे की घटनाएँ अधिक बार और अधिक लंबे समय तक देखने को मिल सकती हैं। इससे प्राकृतिक जलस्रोत, कुएँ, कृषि उत्पादन और ग्रामीण क्षेत्रों की पेयजल व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि जलागम प्रबंधन, प्राकृतिक स्रोतों का पुनर्जीवन, मृदा एवं जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देने तथा प्रकृति-आधारित समाधानों को प्राथमिकता देकर कोसी नदी बेसिन की जल सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता को मजबूत बनाया जा सकता है। यह अध्ययन भविष्य की जल नीति और हिमालयी क्षेत्रों में सतत जल प्रबंधन के लिए एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक दस्तावेज माना जा रहा है।

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