आईआईटी रुड़की के शोध में हिमालयी मौसम प्रणालियों में उभरते जलवायु संकेतों का खुलासा

(ब्योरो दिलशाद खान ।KNEWS18)
आईआईटी रुड़की, उत्तराखंड | 11 फरवरी 2026
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के एक महत्वपूर्ण शोध अध्ययन ने हिमालयी क्षेत्र को प्रभावित करने वाली प्रमुख मौसम प्रणाली पश्चिमी विक्षोभों (वेस्टर्न डिस्टर्बेंसेज़) के व्यवहार में बड़े बदलावों का खुलासा किया है। यह अध्ययन प्रतिष्ठित इंटरनेशनल जर्नल ऑफ क्लाइमेटोलॉजी में प्रकाशित हुआ है, जिसने हिमालय और उत्तरी भारत में बदलते वर्षा पैटर्न, आपदा जोखिम और जल सुरक्षा को लेकर नई चिंताएँ खड़ी की हैं।
पश्चिमी विक्षोभ पारंपरिक रूप से शीतकालीन हिमपात और वर्षा से जुड़े रहे हैं, लेकिन आईआईटी रुड़की के इस अध्ययन के अनुसार अब इनका प्रभाव प्री-मानसून काल में भी तेजी से बढ़ रहा है। मार्च से मई के बीच इन प्रणालियों की बढ़ती सक्रियता ने हिमालयी क्षेत्रों में मौसमी संतुलन को प्रभावित किया है, जिससे अचानक भारी वर्षा, बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ गया है।
शोध में सात दशकों से अधिक के वायुमंडलीय और वर्षा संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि पश्चिमी विक्षोभ अब पहले की तुलना में लंबी दूरी तय कर रहे हैं, अधिक नमी एकत्र कर रहे हैं और ऊपरी वायुमंडल में तेज हवाओं के साथ अधिक सशक्त रूप में भारतीय उपमहाद्वीप तक पहुँच रहे हैं। इन संरचनात्मक और मौसमी परिवर्तनों के कारण पारंपरिक शीतकालीन अवधि के बाहर भी तीव्र वर्षा दर्ज की जा रही है।
अध्ययन के अनुसार, ऊष्मायन जलवायु न केवल चरम मौसम घटनाओं को तीव्र बना रही है, बल्कि बड़े पैमाने की वायुमंडलीय प्रणालियों के समय, संरचना और प्रभाव को भी पुनःपरिभाषित कर रही है। इसके दीर्घकालिक प्रभाव हिमालयी राज्यों की जल उपलब्धता, कृषि, बुनियादी ढाँचे और आपदा प्रबंधन पर पड़ सकते हैं।
आईआईटी रुड़की की पीएचडी शोधार्थी स्पंदिता मित्रा ने कहा, “दीर्घकालिक जलवायु आंकड़ों के विश्लेषण से यह स्पष्ट हो रहा है कि पश्चिमी विक्षोभ अपनी मौसमी भूमिका बदल रहे हैं। हाल के वर्षों में देखी गई अनियमित वर्षा और चरम घटनाएँ इन व्यापक वायुमंडलीय परिवर्तनों का परिणाम हैं। 2023 की हिमाचल बाढ़ और 2025 की उत्तराखंड बाढ़ जैसे उदाहरण इस बदलते स्वरूप को दर्शाते हैं।”
अध्ययन के प्रधान अन्वेषक प्रो. अंकित अग्रवाल ने बताया कि विशेष रूप से प्री-मानसून अवधि में पश्चिमी विक्षोभों में आए बदलावों का हिमालयी क्षेत्र के जल संसाधनों और आपदा संवेदनशीलता पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने जलवायु मॉडल और पूर्वानुमान प्रणालियों की पुनर्समीक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया।
आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रो. के.के. पंत ने कहा कि यह शोध पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में जलवायु सहनशीलता की योजना को नया दृष्टिकोण प्रदान करता है। उन्होंने वैज्ञानिक निष्कर्षों को नीति, अवसंरचना और आपदा तैयारी से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।
शोधकर्ताओं का मानना है कि बदलते मौसम पैटर्न के अनुरूप ढलने के लिए विज्ञान, शासन और नियोजन के बीच समन्वित प्रयास अनिवार्य होंगे, ताकि हिमालयी क्षेत्रों में जीवन, आजीविका और पारिस्थितिकी की रक्षा की जा सके।






