आईआईटी रुड़की के शोधकर्ताओं ने दवा-प्रतिरोधी रोगजनक की चयापचय संबंधी कमजोरी का किया खुलासा
(ब्योरो दिलशाद खान।KNEWS18)
रुड़की, उत्तराखंड, 24 जून, 2026: आईआईटी रुड़की के शोधकर्ताओं ने Acinetobacter baumannii में एक महत्वपूर्ण चयापचय संबंधी कमजोरी का पता लगाया है। यह एक नोसोकोमियल (अस्पताल-जनित) रोगजनक है, जो विश्वभर में गंभीर अस्पताल-जनित संक्रमणों के लिए जिम्मेदार है। यह खोज बताती है कि यह खतरनाक रोगजनक एंटीबायोटिक दबाव और मेजबान की प्रतिरक्षा प्रणाली से बचने के लिए अतिरिक्त (रेडंडेंट) चयापचय मार्गों का उपयोग कैसे करता है, तथा भविष्य में रोगाणुरोधी (एंटीमाइक्रोबियल) उपचारों के विकास के लिए एक आशाजनक दिशा प्रदान करती है।
यह अध्ययन जैव विज्ञान एवं जैव अभियांत्रिकी विभाग की प्रोफेसर रंजना पठानिया के नेतृत्व में किया गया। शोध कार्य पीएचडी शोधार्थी अविक पाठक तथा पोस्टडॉक्टोरल फेलो डॉ. स्नेहलता सैनी द्वारा संपन्न किया गया। अध्ययन प्रतिष्ठित सहकर्मी-समीक्षित (पीयर-रिव्यूड) जर्नल mBio में प्रकाशित हुआ है। इसके निष्कर्ष महत्वपूर्ण यांत्रिक (मैकेनिस्टिक) जानकारियां प्रदान करते हैं, जो इस प्राथमिकता प्राप्त रोगजनक के विरुद्ध मौजूदा एंटीबायोटिकों की प्रभावशीलता बढ़ाने हेतु भविष्य की चिकित्सीय रणनीतियों के विकास में सहायक हो सकते हैं।
Acinetobacter baumannii अपनी असाधारण क्षमता के कारण वैश्विक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है, क्योंकि यह अस्पतालों के वातावरण में लंबे समय तक जीवित रह सकता है और अनेक प्रकार की एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति तेजी से प्रतिरोध विकसित कर लेता है। उपचार के विकल्प लगातार सीमित होते जा रहे हैं, इसलिए ऐसे नवीन उपचारों की तत्काल आवश्यकता है जो इस जीवाणु के जीवन-रक्षक तंत्रों को लक्षित कर सकें। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कार्बापेनेम-प्रतिरोधी Acinetobacter baumannii को उन सर्वोच्च प्राथमिकता वाले जीवाणु रोगजनकों में शामिल किया है, जिनके लिए नई उपचार रणनीतियों का विकास अत्यंत आवश्यक है।
आईआईटी रुड़की की टीम ने सिस्टीन चयापचय की भूमिका को समझने पर ध्यान केंद्रित किया, जो एक मूलभूत जैविक प्रक्रिया है और कई महत्वपूर्ण कोशिकीय कार्यों को समर्थन प्रदान करती है। उनके शोध से पता चला कि यह जीवाणु सिस्टीन जैवसंश्लेषण के लिए दो आंशिक रूप से अतिरिक्त एंजाइमों—CysE और SAT—पर निर्भर करता है। इस मार्ग को बाधित करने से कोशिका के भीतर सिस्टीन का स्तर काफी कम हो जाता है, जिससे व्यापक चयापचय अव्यवस्था, ऊर्जा उत्पादन में कमी, ऑक्सीडेटिव तनाव में वृद्धि तथा पारंपरिक एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाती है।
महत्वपूर्ण रूप से, शोधकर्ताओं ने पाया कि यद्यपि यह रोगजनक सिस्टीन जैवसंश्लेषण में कमी की आंशिक भरपाई सिस्टीन के ऑक्सीकृत रूप सिस्टीन (Cystine) के अवशोषण के माध्यम से कर सकता है, लेकिन जब दोनों मार्गों को एक साथ बाधित किया गया, तो इससे सिंथेटिक लेथैलिटी उत्पन्न हुई और संक्रमण के दौरान जीवाणु की जीवित रहने तथा संक्रमण स्थापित करने की क्षमता में उल्लेखनीय कमी आई। यह निष्कर्ष एक ऐसी चयापचय निर्भरता को उजागर करता है, जिसे भविष्य की रोगाणुरोधी रणनीतियों में प्रभावी रूप से लक्षित किया जा सकता है।
अध्ययन के महत्व को स्पष्ट करते हुए, अध्ययन की प्रमुख अन्वेषक प्रो. रंजना पठानिया ने कहा, “हमारे अध्ययन से पता चलता है कि Acinetobacter baumannii अपनी चयापचयीय क्षमता बनाए रखने के लिए सिस्टीन जैवसंश्लेषण और अवशोषण मार्गों के एक संतुलित नेटवर्क पर निर्भर करता है। यद्यपि जीवाणु एक मार्ग के बाधित होने पर इसकी भरपाई कर सकता है, लेकिन दोनों प्रणालियों में एक साथ हस्तक्षेप करने से उसके अस्तित्व पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। ये निष्कर्ष महत्वपूर्ण यांत्रिक समझ प्रदान करते हैं और बहु-दवा प्रतिरोधी संक्रमणों के विरुद्ध संयोजन आधारित उपचारों के विकास के लिए नए अवसर प्रस्तुत करते हैं।”
आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रो. कमल किशोर पंत ने कहा, “रोगाणुरोधी प्रतिरोध वैश्विक स्वास्थ्य के समक्ष एक गंभीर चुनौती बना हुआ है। यह शोध जीवाणुओं के जीवित रहने के तंत्रों की हमारी समझ को आगे बढ़ाता है तथा Acinetobacter baumannii में महत्वपूर्ण चयापचयीय कमजोरियों की पहचान करता है। इससे नवोन्मेषी रोगाणुरोधी उपचारों के विकास के लिए नए मार्ग खुलते हैं और वैश्विक चुनौतियों के समाधान हेतु प्रभावशाली अनुसंधान के प्रति आईआईटी रुड़की की प्रतिबद्धता और सुदृढ़ होती है।”
Acinetobacter baumannii अपनी चयापचयीय दृढ़ता को कैसे बनाए रखता है और एंटीबायोटिक दबाव के बीच कैसे जीवित रहता है, इसका खुलासा करके यह अध्ययन जीवाणु शरीरक्रिया विज्ञान और अनुकूलन क्षमता की वैज्ञानिक समझ को आगे बढ़ाता है। इसके निष्कर्ष भविष्य में ऐसी संयोजन आधारित उपचार रणनीतियों के विकास के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करते हैं, जो दवा-प्रतिरोधी रोगजनकों की चयापचयीय कमजोरियों को लक्षित कर सकें और रोगाणुरोधी प्रतिरोध की बढ़ती वैश्विक चुनौती से निपटने के प्रयासों में योगदान दे सकें।
शोध के निष्कर्ष mBio में प्रकाशित हुए हैं और DOI के माध्यम से उपलब्ध हैं: https://doi.org/10.1128/mbio.00842-26
