खानपुर के बाद मंगलौर में पेड़ माफियाओं का तांडव: 71 आम के पेड़ कटे,रालोद नेता समेत तीन पर मुकदमा, विभागीय कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

(ब्योरो दिलशाद खान।KNEWS18)

मंगलौर। उत्तराखंड के मंगलौर क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण के दावों के बीच एक गंभीर मामला सामने आया है, जहां बिना सरकारी अनुमति के आम के 71 हरे पेड़ों को काट दिया गया। यह घटना अब्दुल कलाम चौक फ्लाईओवर के पास स्थित एक बगीचे की है। उद्यान विभाग की तहरीर पर पुलिस ने रालोद नेता उबेदुर्रहमान उर्फ मोन्टी और उनके दो सगे भाइयों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
उद्यान विभाग के प्रभारी प्रताप सिंह के अनुसार विभाग को बड़े पैमाने पर अवैध कटान की सूचना प्राप्त हुई थी। सूचना के आधार पर उद्यान और वन विभाग की संयुक्त टीम ने मौके पर पहुंचकर निरीक्षण किया। जांच में पाया गया कि बगीचे में खड़े 71 आम के हरे पेड़ों को जड़ से काटकर वहीं गिरा दिया गया था। कटे हुए पेड़ों की लकड़ी भी मौके पर पड़ी मिली, जिससे साफ है कि कटान हाल ही में किया गया।
प्रारंभिक जांच में यह भी सामने आया कि पेड़ों की कटाई के लिए किसी प्रकार की वैध अनुमति नहीं ली गई थी। नियमानुसार किसी भी फलदार पेड़ को काटने से पहले संबंधित विभाग से अनुमति लेना अनिवार्य होता है। इसके बावजूद इतने बड़े पैमाने पर कटान किया जाना पर्यावरणीय कानूनों की खुली अवहेलना माना जा रहा है।
उद्यान प्रभारी प्रताप सिंह ने बाग मालिकों को नामजद करते हुए पुलिस को तहरीर दी, जिसके आधार पर कोतवाली प्रभारी अमरजीत सिंह ने बताया कि मंगलौर के रालोद नेता  उनके भाई समेत तीन लोगों के खिलाफ संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है।

हाल ही में भगवानपुर क्षेत्र के खानपुर में भी हाईवे किनारे स्थित एक बाग को बिना अनुमति पूरी तरह साफ कर दिया गया। मामले के सामने आने पर विभाग ने कार्रवाई करते हुए संबंधित लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
घटना की गंभीरता को देखते हुए उप प्रभागीय वन अधिकारी ज्वालाप्रसाद भी मौके पर पहुंचे और उन्होंने बगीचे का बारीकी से निरीक्षण किया। उन्होंने बताया कि प्रथम दृष्टया यह मामला संगठित तरीके से किए गए अवैध कटान का प्रतीत होता है। उनका कहना है कि यदि आरोपियों में कानून का भय नही होता, तो वे कटे हुए पेड़ों को मौके पर छोड़कर फरार नहीं होते। वन विभाग की टीम ने पूरे क्षेत्र का निरीक्षण कर साक्ष्य एकत्र किए हैं।
हालांकि इस घटना ने वन विभाग और उद्यान विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों का कटान हो गया और संबंधित विभागों को इसकी भनक तक नहीं लगी। इससे विभागीय निगरानी और सतर्कता पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।
एक ओर जहां शासन और प्रशासन हरेला पर्व जैसे अभियानों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण और वृक्षारोपण को बढ़ावा देने के दावे करते हैं, वहीं दूसरी ओर इस तरह की घटनाएं इन दावों की पोल खोलती नजर आती हैं। हरे-भरे वृक्षों की अंधाधुंध कटाई से पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश व्याप्त है। लोगों का कहना है कि पेड़ काटने वाले माफियाओं में कानून का कोई भय नहीं रह गया है।
फिलहाल प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए सख्त कार्रवाई के संकेत दिए हैं। अधिकारियों का कहना है कि दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं पर प्रभावी रोक लगाई जा सके और पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को मजबूती मिल सके।

 

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