आईआईटी रुड़की का नवाचार: अपशिष्ट जल से संसाधन पुनर्प्राप्ति की दिशा में बड़ी पहल

(ब्योरो दिलशाद खान।KNEWS18)
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की (आईआईटी रुड़की) में हाल ही में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण शोध ने अपशिष्ट जल पुनः उपयोग, जल सुरक्षा और संसाधन पुनर्प्राप्ति के क्षेत्र में नए रास्ते खोले हैं। यह अध्ययन माइक्रोएल्गल फोटोग्रैन्यूल्स के माध्यम से जल उपचार और संसाधन पुनर्प्राप्ति पर केंद्रित है, जो ऊर्जा-कुशल, प्रकृति-आधारित और परिपत्र जैव-अर्थव्यवस्था की दिशा में एक सशक्त कदम माना जा रहा है। यह शोध भारत की प्राथमिकताओं को उभरती वैश्विक पर्यावरणीय आवश्यकताओं से जोड़ने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अध्ययन में अपशिष्ट जल उपचार को एल्गल बायोरिफाइनरी सिद्धांतों के साथ एकीकृत किया गया है, जिससे न केवल जल शोधन संभव होता है, बल्कि पोषक तत्वों की पुनर्प्राप्ति और जल पुनः उपयोग को भी बढ़ावा मिलता है। यह दृष्टिकोण विशेष रूप से ऐसे समय में अत्यंत प्रासंगिक है, जब भारत जल संकट, पोषक तत्व प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसी जटिल चुनौतियों का सामना कर रहा है। शोध परिणाम यह दर्शाते हैं कि उन्नत वैज्ञानिक तकनीकों को व्यावहारिक और स्केलेबल समाधानों में बदला जा सकता है, जिनका उपयोग शहरी और कृषि-आधारित दोनों क्षेत्रों में किया जा सके।
यह अनुसंधान प्रो. संजीव कुमार प्रजापति, प्रधान अन्वेषक, पर्यावरण एवं जैवईंधन अनुसंधान प्रयोगशाला (EBRL), हाइड्रो एवं नवीकरणीय ऊर्जा विभाग, आईआईटी रुड़की के नेतृत्व में किया गया। शोध दल में श्री हर्षित तिवारी सहित अन्य शोधकर्ताओं ने भी सक्रिय योगदान दिया। यह कार्य अंतर्विषयी सहयोग और नवाचार का उदाहरण है, जो सतत जल उपचार प्रौद्योगिकियों के विकास में सहायक सिद्ध हो रहा है।
यह शोध भारत सरकार की प्रमुख पहलों—राष्ट्रीय जल मिशन, जल जीवन मिशन, जल शक्ति अभियान, स्वच्छ भारत मिशन और आत्मनिर्भर भारत—के अनुरूप है। ये सभी पहलें सतत अवसंरचना, संसाधन दक्षता और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने पर केंद्रित हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे शैक्षणिक प्रयास साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण और व्यवहारिक क्रियान्वयन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रो. के. के. पंत ने इस अवसर पर कहा कि अनुसंधान संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे समाज की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुरूप, वैज्ञानिक रूप से सुदृढ़ और वैश्विक स्तर पर प्रासंगिक समाधान विकसित करें। उन्होंने कहा कि सतत जल प्रौद्योगिकियों में प्रगति दीर्घकालिक पर्यावरणीय और आर्थिक सहनशीलता के लिए अनिवार्य है।
वहीं, प्रो. संजीव कुमार प्रजापति ने कहा कि अनुसंधान परिणामों को राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों और वैश्विक सततता ढाँचों से जोड़ना आवश्यक है, ताकि नवाचार प्रयोगशालाओं से निकलकर वास्तविक जीवन में प्रभावी योगदान दे सकें। यह अध्ययन संयुक्त राष्ट्र के कई सतत विकास लक्ष्यों, विशेष रूप से एसडीजी-6, 9, 12 और 13 के अनुरूप है।
कुल मिलाकर, यह शोध आईआईटी रुड़की की उस प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जिसके तहत वह विज्ञान, नवाचार और नीति के माध्यम से भारत और विश्व की जल एवं पर्यावरणीय चुनौतियों के समाधान में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।






