आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिकों का अंतरराष्ट्रीय शोध में योगदान, सुपरहैवी तत्व में रासायनिक बंध की मजबूती का हुआ अध्ययन
(ब्योरो दिलशाद खान KNEWS 18)
रुड़की, 22 अक्टूबर। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के वैज्ञानिकों ने सुपरहैवी तत्वों के रासायनिक गुणों को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय शोध में योगदान दिया है। जर्मनी के डार्मस्टाट स्थित GSI/FAIR के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन में पहली बार किसी सुपरहैवी तत्व के यौगिक में रासायनिक बंध की मजबूती का प्रयोगात्मक आकलन किया गया। शोध में सीबोर्गियम (Sg), जिसका परमाणु क्रमांक 106 है, के हेक्साकार्बोनिल यौगिक Sg(CO)6 का अध्ययन किया गया। इस शोध के निष्कर्ष प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका Nature में प्रकाशित हुए हैं।
इस अंतरराष्ट्रीय शोध में आईआईटी रुड़की की प्रोफेसर मौमिता मैती सहित विभिन्न संस्थानों के वैज्ञानिकों ने हिस्सा लिया। अध्ययन से पता चला कि सीबोर्गियम और कार्बन मोनोऑक्साइड के बीच रासायनिक बंध अपेक्षा से कमजोर है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इसका प्रमुख कारण अत्यधिक भारी परमाणुओं में दिखाई देने वाले सापेक्षिक प्रभाव हैं, जो उनकी इलेक्ट्रॉनिक संरचना और रासायनिक व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
सुपरहैवी तत्वों का अध्ययन क्यों है चुनौतीपूर्ण?
सुपरहैवी तत्वों को कण त्वरकों में नाभिकीय संलयन अभिक्रियाओं के माध्यम से कृत्रिम रूप से बनाया जाता है। इनका उत्पादन बेहद कम होता है और इनका जीवनकाल भी अत्यंत छोटा होता है। कई मामलों में वैज्ञानिकों को प्रतिदिन केवल कुछ परमाणु ही प्राप्त होते हैं। ऐसे में इनके रासायनिक गुणों का प्रयोगात्मक अध्ययन करना विज्ञान की सबसे चुनौतीपूर्ण प्रक्रियाओं में से एक है।
इन तत्वों में नाभिक के अत्यधिक धनात्मक आवेश के कारण इलेक्ट्रॉन बहुत तेज गति से गति करते हैं। इससे सापेक्षिक प्रभाव उत्पन्न होते हैं, जो परमाणु की इलेक्ट्रॉनिक संरचना को बदल सकते हैं। परिणामस्वरूप, किसी तत्व के रासायनिक गुण उसके हल्के समजात तत्वों से अलग हो सकते हैं।
टंगस्टन से तुलना में सामने आया महत्वपूर्ण परिणाम
शोधकर्ताओं ने सीबोर्गियम के यौगिक की तुलना टंगस्टन के हेक्साकार्बोनिल यौगिक W(CO)6 से की। सामान्यतः क्रोमियम से मोलिब्डेनम और फिर टंगस्टन तक इस समूह के हेक्साकार्बोनिल यौगिकों की स्थिरता बढ़ती है। इसी आधार पर सीबोर्गियम में भी बंध की मजबूती बढ़ने की उम्मीद थी, लेकिन प्रयोग में इसके विपरीत परिणाम मिले।
प्रयोग के दौरान कुल 75 सीबोर्गियम परमाणुओं का पता लगाया गया, जिनमें से केवल तीन हेक्साकार्बोनिल डिटेक्टर तक पहुंचे। इसके मुकाबले टंगस्टन के लगभग 17 प्रतिशत परमाणुओं ने समान प्रकार का यौगिक बनाया। इन परिणामों के आधार पर सीबोर्गियम के यौगिक में रासायनिक बंध की मजबूती टंगस्टन की तुलना में लगभग 4 किलो जूल प्रति मोल कम आंकी गई।
अत्याधुनिक तकनीक से किया गया प्रयोग
वैज्ञानिकों ने TASCA उपकरण की मदद से परमाणुओं को कार्बन मोनोऑक्साइड युक्त गैस के वातावरण में पहुंचाया। इसके बाद विशेष डिटेक्टरों के माध्यम से उनके नाभिकीय क्षय को दर्ज कर परमाणुओं की पहचान की गई। सीबोर्गियम-259 और टंगस्टन के अल्पजीवी समस्थानिकों का इस्तेमाल करते हुए यौगिक निर्माण की प्रक्रिया का अध्ययन किया गया।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग से विज्ञान को नई दिशा
आईआईटी रुड़की की प्रोफेसर मौमिता मैती ने कहा कि सुपरहैवी तत्वों के रासायनिक गुणों का अध्ययन करने के लिए अत्यधिक सटीकता, विशेष प्रयोगात्मक तकनीकों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता होती है। इस शोध ने विभिन्न संस्थानों की विशेषज्ञता को एक साथ लाकर रासायनिक बंधन पर सापेक्षिक प्रभावों की समझ को आगे बढ़ाया है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, यह उपलब्धि आवर्त सारणी के मूलभूत सिद्धांतों को समझने में महत्वपूर्ण है। अब शोधकर्ता सीबोर्गियम से भी भारी तत्वों के रासायनिक गुणों की जांच के लिए नए प्रयोगों की तैयारी कर रहे हैं। इससे भविष्य में अत्यधिक भारी तत्वों की संरचना, स्थिरता और रासायनिक व्यवहार को समझने के नए रास्ते खुल सकते हैं।

