सरकारी स्कूलों में घटते नामांकन को लेकर यशपाल आर्य का सरकार पर निशाना, बोले- शिक्षा व्यवस्था की स्थिति चिंताजनक
(ब्योरो दिलशाद खान।KNEWS 18)
देहरादून। उत्तराखंड में सरकारी विद्यालयों में लगातार घटते छात्र नामांकन को लेकर नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने राज्य सरकार पर तीखा निशाना साधा है। सरकारी प्राथमिक और जूनियर हाईस्कूलों में 10 या उससे कम विद्यार्थियों की संख्या वाले विद्यालयों के आंकड़ों को लेकर उन्होंने सरकार की शिक्षा नीति और व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े किए हैं।
यशपाल आर्य ने आरोप लगाया कि प्रदेश में बड़ी संख्या में सरकारी विद्यालयों में छात्र संख्या लगातार कम हो रही है। कई स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या बेहद कम रह जाना चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि सरकार को केवल कम नामांकन वाले विद्यालयों की संख्या बताने के बजाय यह जवाब देना चाहिए कि आखिर सरकारी स्कूलों से बच्चे और अभिभावक दूर क्यों हो रहे हैं।
नेता प्रतिपक्ष के अनुसार सरकारी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए सरकार द्वारा बजट में बड़ी राशि का प्रावधान किया जाता है। इसके बावजूद यदि हजारों विद्यालय कम छात्र संख्या की स्थिति में पहुंच रहे हैं तो सरकार को शिक्षा व्यवस्था पर खर्च होने वाली राशि और उसके परिणाम का हिसाब जनता के सामने रखना चाहिए।
उन्होंने सरकार से सवाल किया कि प्रदेश के सरकारी विद्यालयों में स्वीकृत पदों के मुकाबले कितने शिक्षक कार्यरत हैं और कितने पद लंबे समय से खाली हैं। इसके साथ ही उन्होंने विद्यालयों में भवन, शौचालय, पेयजल, बिजली, प्रयोगशाला और डिजिटल सुविधाओं की स्थिति को लेकर भी सरकार से जवाब मांगा।
यशपाल आर्य ने कहा कि ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में सरकारी विद्यालयों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। कई दूरस्थ इलाकों में सरकारी स्कूल ही बच्चों की शिक्षा का प्रमुख आधार हैं। ऐसे में कम नामांकन के आधार पर विद्यालयों को बंद करना या उनका विलय करना समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा कि सरकार को पहले यह पता लगाना चाहिए कि बच्चों का नामांकन क्यों घट रहा है। यदि किसी विद्यालय में शिक्षक पर्याप्त नहीं हैं, आधारभूत सुविधाओं की कमी है या शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर अभिभावकों में भरोसा कम हुआ है तो इन समस्याओं को दूर किया जाना चाहिए।
नेता प्रतिपक्ष ने मांग की कि सरकार प्रदेश के प्रत्येक सरकारी विद्यालय की छात्र संख्या, शिक्षकों की स्थिति और उपलब्ध सुविधाओं का विद्यालयवार विवरण सार्वजनिक करे। साथ ही पिछले वर्षों में बंद अथवा विलय किए गए विद्यालयों की संख्या और वहां पढ़ने वाले बच्चों की शिक्षा की वैकल्पिक व्यवस्था का भी ब्यौरा सामने रखा जाए।
उन्होंने यह भी कहा कि कम नामांकन वाले विद्यालयों के लिए विशेष पुनर्जीवन योजना बनाई जानी चाहिए। दूरस्थ क्षेत्रों में स्थानीय जरूरतों के अनुसार शिक्षा व्यवस्था विकसित करने के साथ पर्याप्त शिक्षक और मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
यशपाल आर्य ने सरकार से स्कूल बंद करने के बजाय “स्कूल बचाने की नीति” पर काम करने की मांग की। उन्होंने कहा कि अभिभावकों और ग्राम समुदाय को विश्वास में लिए बिना विद्यालयों को बंद या विलय करने का निर्णय नहीं लिया जाना चाहिए।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार को शिक्षा व्यवस्था में सुधार के दावों के साथ-साथ परिणामों का भी सार्वजनिक हिसाब देना चाहिए। सरकारी विद्यालय जनता के पैसे से संचालित होते हैं और इनका उद्देश्य प्रदेश के हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है। ऐसे में घटते नामांकन को केवल आंकड़ा मानने के बजाय इसके पीछे के कारणों पर गंभीरता से काम करना जरूरी है।
